रुधौली के परसा तिवारी में श्रीराम कथा के दौरान डॉ. विष्णुकांत शुक्ल ने सुनाया भरत-मिलाप और दशरथ मरण का मार्मिक प्रसंग, उमड़ पड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।
रुधौली (बस्ती)। बुढ़िया समय माता मंदिर, परसा तिवारी में आयोजित श्रीराम कथा में बृहस्पतिवार को कथाव्यास पूज्य डॉ. विष्णुकांत शुक्ल ने भरत मिलाप और श्रीराम वनवास के मार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया। कथा के दौरान जब व्यास जी ने 'राम भक्त ले चला रे राम की निशानी, शीश पे खड़ाऊं अँखियों में पानी' गीत गया, तो वहां उपस्थित श्रोतागण भाव-विभोर हो गए और सभी की आंखें नम हो गईं।
कथा का शुभारंभ प्रभु श्रीराम के पूजन-अर्चन के साथ हुआ। कथाव्यास डॉ. विष्णुकांत शुक्ल ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सुमन्त्र जी प्रभु श्रीराम के साथ वन इस उद्देश्य से गए थे कि वे उन्हें मनाकर वापस अयोध्या ले आएंगे। किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के संकल्प के आगे उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। अयोध्या लौटते समय सुमन्त्र का मन भारी था और वे मार्ग में व्याकुल होकर रुक गए, जिसके बाद निषादराज ने उन्हें समझाकर अयोध्या पहुंचाया।
पुत्र वियोग में राजा दशरथ ने त्यागे प्राण
कथाव्यास ने बताया कि जब महाराज दशरथ को ज्ञात हुआ कि राम वापस नहीं आ रहे, तो वे विलाप करते हुए धरती पर गिर पड़े। उन्होंने बताया कि कैसे अनजाने में श्रवण कुमार की मृत्यु उनके शब्द भेदी बाण से हुई थी, जिस पर ऋषि शांतनु और ज्ञानवती ने श्राप दिया था कि उनकी मृत्यु भी पुत्र वियोग में होगी। इसी श्राप को याद करते हुए और 'राम-राम' कहते हुए महाराज दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए।
भरत का चित्रकूट गमन और खड़ाऊं प्रसंग
गुरु वशिष्ठ के बुलावे पर भरत जी तत्काल अयोध्या लौटे। राम के वनवास और पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर वे स्तब्ध रह गए। पिता का अंतिम संस्कार करने के बाद भरत जी, गुरु वशिष्ठ और माताओं के साथ प्रभु श्रीराम को मनाने वन की ओर चल दिए। निषादराज गुह के सहयोग से भरत की प्रभु से भेंट हुई। भरत के करुण क्रंदन से श्रीराम का मन भी द्रवित हो उठा।
प्रभु श्रीराम ने 'रघुकुल रीत सदा चली आयी, प्राण जाएं पर वचन न जाई' का हवाला देते हुए पिता के वचनों को सर्वोपरि बताया। अंत में, भरत जी ने प्रभु की खड़ाऊं मांगी और संकल्प लिया कि प्रभु के वापस आने तक वे खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन करेंगे।
भक्ति बिना शव समान है प्राणी
कथा के अगले चरण में डॉ. शुक्ल ने कहा, "जिन्ह हरि भगति हृदयँ नहि आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी।।" अर्थात जो मनुष्य श्री हरि की भक्ति को अपने हृदय में धारण नहीं करता, वह जीवित रहते हुए भी शव के समान है।
इसके पश्चात कथा में इंद्र पुत्र जयंत द्वारा कौवे का वेश धरकर सीता जी के चरण पर चोंच मारने, माता अनुसुइया द्वारा सीता जी को पतिव्रत धर्म की शिक्षा, विराध वध, सरभंग उद्धार, सुतीक्षण जी व मुनि अगस्त्य जी से भेंट का वर्णन किया गया। कथा का विश्राम पंचवटी निवास, शूर्पणखा प्रसंग और सीता हरण के बाद जटायु मरण तक के वृत्तांत के साथ हुआ। भगवान ने अस्थियों के समूह को देखकर पृथ्वी को निशाचरों से हीन करने का प्रण भी लिया।
ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर अखिलेश दूबे, अनुराग शुक्ल, पंकज त्रिपाठी, नितीश पाण्डेय 'मनु पण्डित', आदर्श तिवारी, ममता तिवारी, पूनम तिवारी, ईओ रंजन गुप्ता, आदित्य प्रकाश मिश्र, विदिशा शुक्ल, आदित्य पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।



